Thursday, June 21, 2007
This Hurts Me A Lot...
Thanks a lot to all the visitors to Pages From My Diary.... :)
Yet.... There's something... I would like to add here... Many People are copying my work, or in easy words.... They are stealing my work, without mentioning my name anywhere where they post it... :( And also, upon being caught up, they insist it is their work.... This really feels sad, and depressing to me... After all, I am a human Being, so these things hurt a lot... :(
And, this is the one major reason, I am not posting anything new here... Frankly speaking... I could not....
I know, Net world is full of these kind of people, but Its a request, this budding Poetess wants to say to all....
Please don't do this to me... Please Help me Grow... :( Please Understand my Feelings... Atleast mention my name wherever u post my Work....
Again Thanks a lot... and Keep Smiling always,
God Bless You All....
Wednesday, April 25, 2007
एक कोशिश... तुझे भूल जाने की!!!

तुझे भूलने की कोशिश में,
जब दिल ये ज़िद पे आ गया,
मैं आँख मूँद के बैठ गयी,
तू ख़याल पे फिर छा गया...
ये धड़कन कहीं रुक जाए ना,
मेरी नब्ज़ ठहर ना जाए कहीं,
तूने वक़्त किया मेरा लम्हा लम्हा,
मगर मौत को आसान बना गया...
मेरी हर दलील को किया अनसुनी,
मेरी फ़रियाद भी तो सुनी नहीं,
मैं हैरान हूँ, हाँ कुछ परेशान हूँ,
ऐसा फ़ैसला तू मुझे सुना गया...
मुझे चाँद की कभी तलब ना थी,
मुझे सूरज की भी फ़िक्र नहीं,
बस आँख खोलना ही चाहते थे हम,
मगर तू रोशनी ही बुझा गया....
बेशक भूलना तुझे चाहा बहुत,
हँस कर कभी, रो कर कभी,
दे कर ये आँसुओं की सौगात मुझे,
तू दामन अपना बचा गया....
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Saturday, April 21, 2007
बाबुल!!!

छलके है आँखें, तरसे है मन ये,
रुकी हुई है धड़कन, रुकी रुकी साँसें
डगमगा रही हूँ मैं फिर चलते चलते,
मुझे थामा था मेरे बचपन मे जैसे,
गुडिया को अपनी अपना हाथ फिर थमा दे
बाबुल मुझे फिर से तू अपने पास बुला ले
वो आँगन का झूला क्या अब भी पड़ा है
वो तुलसी का पौधा क्या अब भी खड़ा है
वो स्तरंगी छतरी, वो बारिश का मौसम,
काग़ज़ की कश्ती फिर मेरे लिये एक बना दे
एक बार मुझको फिर से वो बचपन लौटा दे
बाबुल मुझे फिर से तू अपने पास बुला ले
वो गुडिया की कंघी, वो खेल खिलौने,
वो मेरा तकिया और वो मेरे बिछौने,
मेरी कुछ किताबें थी, कुछ अधूरे सपने,
सपने वो मुझको एक बार फिर से लौटा दे
या सामान मेरा गंगा मे बहा दे...
बाबुल मुझे फिर से तू अपने पास बुला ले
कैसे ज़िगर के टुकड़े को कर दिया तूने पराया,
डोली के वक़्त तूने जब कलेज़े से लगाया,
मैने सुना था बाबुल तेरा दिल रो रहा था,
कैसे रोते दिल को तूने फिर था मनाया
बाबुल वैसे ही दिल को एक बार फिर तू मना ले
बाबुल मुझे फिर से तू अपने पास बुला ले
लगी थरथराने जब लौ ज़िन्दगी की,
मैने लाख तुझको दिये थे इशारे,
माँ को भेजी थी ख़त मे एक कली मुरझाई,
भेजी ना राखी, छोड़ दी भाई की सूनी कलाई
मगर बेटी तुम्हारी हो चुकी थी पराई,
शायद नसीब अपना समझा ना पाई,
आखिरी बार मेरी आज तुम फिर कर दो विदाई
लेकिन विदाई से पहले अपनी नज़र मे बसा ले
बाबुल मुझे फिर से तू अपने पास बुला ले
मुझे ख़ाक करने को चला था जब ज़माना,
क्यों रोए थे तुम भी, मुझे ये बताना,
आँखों मे अब ना आँसू फिर कभी लाना
भटक रही है रूह मेरी, तेरे प्यार को फिर से
माथे पे हाथ रख कर मेरी रूह को सुला दे
बाबुल मुझे फिर से तू अपने पास बुला ले
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Thursday, April 19, 2007
कैसे कहे कि रोये हम...
मेरी बेबस सी ये ज़ुबान क्या कहे तुम से,
मगर बहुत रोए रात हम तुझे याद कर के...
वो दीवानगी मेरी, और वो बेबाकपन मेरा,
बस हँसते रहे हम आँखों मे आँसू भर के...
जाने क्यों ना समझे तुम मेरे ज़ज़्बातों को,
हमने तो रख दी हर ख़्वाहिश बे-लिबास कर के...
ये पूछते है लोग, क्या हुआ है तुम्हे "शिखा",
क्यों जी रही हो इस तरह तुम हर रोज़ मर के...
मगर बेबस है ज़ुबान हम क्या कहे तुमसे,
कैसे कहे की रोए है तुम्हे याद कर के...
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Thursday, April 12, 2007
दर्द की हद!!!

ख्वाबों और ख़्यालों का चमन सारा जल गया,
ज़िंदगी का नशा मेरा धुआ बन कर उड़ गया...
जाने कैसे जी रहे है, क्या तलाश रहे है हम,
आँसू पलकों पर मेरी ख़ुशियों से उलझ गया...
सौ सदियों के जैसे लंबी लगती है ये ग़म की रात,
कतरा कतरा मेरी ज़िंदगी का इस से आकर जुड़ गया...
मौत दस्तक दे मुझे तू, अब अपनी पनाह दे दे,
ख़तम कर ये सिलसिला, अब दर्द हद से बढ़ गया...
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Sunday, April 8, 2007
बेज़बान हो गये है हम!!!
कुछ ना सुना मुझे दिल की बात,
मेरा दिल नहीं मेरे बस मे आज...
गमो की बदली से है ढका हुआ,
मेरा चाँद अभी है छुपा हुआ...
आज उदास उदास सी हर राह है
और रूठा हुआ सा मेरा खुदा है...
ये प्यार भी कितना अजीब है,
वो मेरी नज़र के इतने क़रीब है...
मगर समझ के भी है जो नासमझ,
कैसे दिल से मेरे वो गया उलझ...
वह चुप रहा, मैं भी चुप रही,
दरमियाँ बिखरी फिर ख़ामोशी वही....
क्यों मज़बूरियाँ हमसे जीत गयी,
क्यों मुहब्बत की रुत्त बीत गयी ...
सब सवाल अधूरे से रह गये,
बस दो आँसू रुखसार पे बह गये...
किसी को क्या कहे हम अपना ग़म,
सच ..... बेज़ुबान से हो गये है हम.....
Wednesday, April 4, 2007
खामोशी की आदत!!!

मुझे इतनी भी सज़ा ना दे,
मेरे प्यार की इंतहा ना ले...
रुक जा ए चाँद थम जा ज़रा,
दो घड़ी मुझे भी निहार ले...
मैं टूट कर बिखर चली,
मेरी ख़ाक को यूँ हवा ना दे...
दो बोल तुझसे सुन सकूँ कभी,
मैं इंतज़ार मे सदा रही...
तू चल पड़ा मुझे छोड कर,
दीवार सी मैं खड़ी रही...
सहम गयी हूँ बस इस बात से,
कहीं मुझको तू भुला ना दे...
ये क्या किया तूने ए दिल बता,
प्यार तूने क्यों किया भला...
कैसे कहे अब ये मेरी ज़ुबान,
इक बार तो मुझको गले लगा...
ख़ामोशी की ये आदत कही,
मुझे बेजुबान ही बना ना दे...
